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21वीं सदी में भी सीवरेज से बाहर ना निकल पाया इंसान


Updated On: 2019-08-24 06:54:01 21वीं सदी में भी सीवरेज से बाहर ना निकल पाया इंसान

भारत चांद पर पहुंचने जा रहा है। आईएसआरओ के मुताबिक, चंद्रयान-2 चांद की ओर बढ़ रहा है। 7 सितंबर को चंद्रयान-2 के साथ गए लैंडर विक्रम की चांद की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग कराई जाएगी। यह हमारे देश की बड़ी सफलता होगी। 

यह तो रही आसमान की खबर। अब निगाह मारते हैं जमीन पर। चांद पर पहुंचने जा रहे भारत देश में आज भी हजारों इंसान ऐसे हैं, जो कि गटर से बाहर नहीं निकल पाए हैं। हम बात कर रहे हैं उन मैला ढोने वाले सफाई कर्मियों की, जो कि आज भी संसाधन-मशीनरी उपलब्ध ना करवाए जाने के कारण सीवरेज में उतरने के लिए मजबूर हैं।

21वीं सदी, जिसे विज्ञान का युग कहा जाता है, उसमेें भी इन्हें जरूरी संसाधन मुहैया नहीं करवाए जा सके हैं। जहरीली गैसों वाले सीवरेज, जहां मशीनें सफाई के लिए पहुंचनी चाहिए थीं, वहां उतरने के लिए इंसान मजबूर हो रहे हैं और लाशों में तब्दील हो रहे हैं।

इसी तरह की एक घटना गाजियाबाद में 23 अगस्त को हुई। यहां एक जल निकासी परियोजना में काम करने वाले पांच सफाई मजदूर बिना सुरक्षा उपकरण सीवरेज में उतरे थे, लेकिन वे जिंदा वापस नहीं लौटे। दम घुटने से उनकी मौत हो गई। जिला प्रशासन के मुताबिक, घरेलू सीवर लाइनों को शहर की मुख्य जल निकासी प्रणाली के साथ जोडऩे वाली एक परियोजना पर ये लोग काम कर रहे थे। इस परियोजना को गाजियाबाद नगर निगम ने मंजूरी दी है।

मृतकों की पहचान दामोदर (40), होरली (35), संदीप (30), शिवकुमार (32) और विजय कुमार (40) के रूप में हुई है। देश में ऐसी घटनाएं आम हैं। संसाधन-मशीनरी उपलब्ध ना होने के चलते सफाई मजदूर जान जोखिम में डालकर सीवरेज में उतरने के लिए मजबूर हैं।

सफाई कर्मचारी आंदोलन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले एक दशक में सीवरेज साफ करते हुए 1850 सफाई मजदूरों की मौत हो चुकी है। देश में हर 5 दिन में एक सफाई मजदूर की सीवरेज में मौत हो जाती है।

यह स्थिति गंभीर है। आम तौर पर देखा गया है कि सफाई के काम में लगे मजदूर अधिकतर दलित समाज से होते हैं। हाशिये के इन लोगों की अनदेखी सरकारों द्वारा लगातार होती रही है।

गंदगी भरे माहौल में काम करने के चलते ये लोग अपनी पूरी जिंदगी भी जी नहीं पाते और बीमारियों के चलते पहले ही दम तोड़ जाते हैं। इन्हें अच्छी जिंदगी देने के लिए सरकारी तौर पर गंभीरता दिखाई नहीं देती।

एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, मोदी सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल के दौरान स्वच्छ भारत अभियान शुरू किया था। साल 2014-15 में इस योजना के तहत 18,000 करोड़ रुपये खर्च करने का लक्ष्य रखा गया था। यह हैरानीजनक था कि स्वच्छ भारत मिशन को सफल बनाने का मुख्य तौर पर जिम्मा जिन सफाई कर्मचारियों पर था, उनकी ही अनदेखी की गई। 18,000 करोड़ रुपये में से सिर्फ 47 करोड़ मैला ढोने वाले मजदूरों के लिए रखे गए।

इसी तरह एनडीए सरकार ने 2015-16 में 10.01 करोड़, 2016-17 में 1 करोड़ और 2017-18 में 5 करोड़ रुपये इस मद में खर्च किए। दूसरी ओर एक आरटीआई के मुताबिक, इन वर्षों में इससे कहीं अधिक रकम (530 करोड़ रुपये) सरकार ने टीवी और प्रिंट मीडिया में स्वच्छ भारत अभियान के प्रचार पर खर्च कर दी।

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