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स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली : 11 हजार की आबादी पर सिर्फ 1 डॉक्टर

देश के करीब 5.50 करोड़ लोग अपनी सेहत पर भारी खर्च के कारण आर्थिक तंगी के शिकार हो गए हैं, जबकि 3 करोड़ 80 लाख लोग सिर्फ दवाइयों का खर्च उठाते-उठाते गरीबी रेखा के नीचे पहुंच गए। ब्रिटिश मेडिकल जनरल में पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के प्रकाशित सर्वे में यह बात सामने आई है। 

यह रिपोर्ट बताती है कि महंगे इलाज ने कई परिवारों को तबाह कर दिया। समस्या यह है कि देश के अधिकतर सरकारी अस्पताल आज भी कई बिमारियों का इलाज करने में पूरी तरह सामथ्र्य नहीं हैं। सरकारी अस्पतालों में जरूरी उपकरणों तक का प्रबंध नहीं है। ऐसे हालात में मरीज मजबूरी में प्राइवेट अस्पतालों का रुख करते हैं, जहां उनसे इलाज के नाम पर पैसों की लूट होती है।

देश में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली संबंधी एक और रिपोर्ट सामने आई है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के सेंट्रल ब्यूरो ऑफ हेल्थ इंटेलीजेंस की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2017 के दौरान सरकार के राष्ट्रीय परीक्षण कार्यक्रम के तहत जांच में यह पाया गया कि डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों की तादाद महज एक साल में दोगुनी हो गई है।

द वायर की खबर के अनुसार, रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2017 के दौरान सरकार के राष्ट्रीय परीक्षण कार्यक्रम के तहत जांच में यह भी पाया गया कि एक साल के दौरान कैंसर के मामले भी 36 फीसदी तक बढ़ गए हैं। दूसरी तरफ देश में डॉक्टरों की भारी कमी है और फिलहाल देश में 11,082 की आबादी पर मात्र एक डॉक्टर है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय मानकों के अनुसार, यह अनुपात प्रति एक हजार व्यक्तियों पर एक होना चाहिए। इस लिहाज से देखें तो यह अनुपात तय मानकों के मुकाबले 11 गुना कम है।

डॉक्टरों की कमी होने का नतीजा यह है कि झोलाछाप डॉक्टरों को लोगों के जीवन से खिलवाड़ करने का मौका मिल जाता है। गैर सरकारी संगठनों की मानें तो स्वास्थ्य के क्षेत्र में ग्रामीण इलाकों की हालत बहुत खराब है। इन इलाकों में झोलाछाप डॉक्टरों की तादाद में भारी इजाफा हुआ है।

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