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फुटपाथों पर गुमनाम जिंदगी, राजधानी की सडक़ों पर मरने वालों में 80 फीसदी लोग होते हैं बेघर


Updated On: 2015-12-09 10:14:16 फुटपाथों पर गुमनाम जिंदगी, राजधानी की सडक़ों पर मरने वालों में 80 फीसदी लोग होते हैं बेघर

नई दिल्ली। 70 साल के राम बहादुर पिछले करीब 30 सालों से देश की राजधानी की सडक़ों पर जिंदगी गुजार रहे हैं। सडक़ किनारे बना फुटपाथ ही अब उनका घर है।

वह कहते हैं कि दुनिया में अब उनका कोई नहीं है। न बीवी-बच्चे, न रिश्तेदार और न ही कोई दोस्त। उनकी तरह ही फुटपाथ पर जिंदगी गुजारने वाले अब उनके कुछ साथी हैं।

राम बहादुर रोजाना जिंदगी के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। यह लड़ाई है जिंदा रहने की। वह मायूस होकर कहते हैं कि अब उनकी जिंदगी बस चंद दिनों की है, क्योंकि वह अपने जीवन का बड़ा हिस्सा काट चुके हैं। बूढ़ा हो गया हूं। अब और कितने दिन बचे हैं? बस अब, तब की बात है और मैं चल दूंगा।

अनुमान के मुताबिक राम बहादुर की तरह ही दिल्ली की सडक़ों पर गुजर बसर करने वालों की संख्या तीन लाख से भी अधिक है। इनमें महिलाओं और बच्चों की संख्या भी काफी है।

ये वे लोग हैं, जो अपना पेट भरने के लिए रोजाना मशक्कत करते हैं। कूड़ा उठाते हैं, शादियों में बर्तन साफ करते हैं और मजदूरी करते हैं।

जिनके हाथ-पांव सलामत हैं, वे तो किसी तरह से गुजारा कर लेते हैं, मगर जो शारीरिक रूप से अक्षम हैं, उनकी जिंदगी बहुत मुश्किल है। इन्हीं में से एक हैं राजेंद्र, जो दिल्ली रोजगार की तलाश में आए थे, लेकिन एक सडक़ दुर्घटना में उन्होंने अपनी बाईं टांग गंवा दी।

निगमबोध घाट के पास यमुना नदी के किनारे वह खुले आसमान के नीचे सोते हैं। राजेंद्र कहते हैं कि कबाड़ चुनने जा रहा था कि तभी सडक़ पार करते हुए एक मोटरसाइकल सवार ने टक्कर मार दी। वो तो मार के भाग गया, मगर मैं घायल हालत में वहीं पड़ा रह गया। किसी ने मदद नहीं की...न पुलिस वालों ने न आने-जाने वालों ने।

वह बताते हैं, फुटपाथ पर पड़े-पड़े पैर के जख्म में कीड़े पड़ गए। कोई जानने वाला मुझे उन सरदारजी के पास उठा कर ले गया जो गरीबों के बीच रोज खाना बांटते हैं। उन्हीं सरदार जी ने मुझे अस्पताल में भर्ती करवाया, मगर तब तक मेरा पैर सड़ चुका था और उसे काटने की नौबत आ गई।

शारीरिक अक्षमता से जूझ रहे जगदीश की भी कहानी राजेंद्र जैसी है। एक तो गरीबी की मार और उस पर शारीरिक अक्षमता। अब इन्हें पता नहीं कि क्या करें।

बस अड्डे के पास फुटपाथ पर रहने वाले बेघरों को खाना खिाने वाले राजेंद्र कहते हैं कि वह पिछले 10 साल से दिल्ली में अपने एक परिचित के चलाए जा रहे प्रोग्राम के तहत बेघरों के लिए भोजन का इंतजाम कर रहे हैं। वह कहते हैं कि उन्होंने कभी सरकारी महकमे के किसी कर्मचारी को इनकी सुध लेते नहीं देखा।

सूचना के अधिकार के लिए काम करने वाले नंद लाल का कहना है कि कश्मीरी गेट और यमुना के पुस्ता के नजदीक सबसे ज्यादा बेघर लोग रहते हैं। वह कहते हैं कि हर साल कश्मीरी गेट थाने में सबसे ज्यादा बेघरों की मौतें दर्ज की जाती हैं।

नंद लाल का कहना है कि कुछ गैर सरकारी संस्थाओं और कुछ चुनिंदा लोगों के अलावा खुले आसमान के नीचे रह रहे लोगों के बारे कोई नहीं सोचता। हालांकि दिल्ली की सरकार ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को लिखे अपने प्रतिवेदन में कहा है कि दिल्ली की सडक़ों पर रह रहे बेघरों की तादाद दस हजार के आसपास है।

सरकार का आंकड़ा खचाखच भरे 300 रैन बसेरों में रहने वाले लोगों पर आधारित है। जिन्हें रैन बसेरों में जगह नहीं मिली, उनका जिक्र सरकारी आंकड़ों में भी नहीं है। वे गुमनामी में जीते हैं और गुमनामी में ही मर जाते हैं।

हाल ही में सेंटर फॉर होलिस्टिक डेवलपमेंट नाम की एक गैर सरकारी संस्था ने एक शोध कर दावा किया कि दिल्ली की सडक़ों पर मरने वाले अज्ञात लोगों में 80 प्रतिशत बेघर लोग ही हैं।

जनगणना 2011 के मुताबिक भारत के ग्रामीण क्षेत्र में बेघरों की संख्या 8,34,541, जबकि शहरी क्षेत्र में 9,38,348 है। वहीं 2001 में शहरों में 7,78,599 व गांवों में 11,64,877 लोग बेघर थे।

(साभार : बीबीसी)

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