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जाति व्यवस्था का दंश : दलित उत्पीडऩ के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे आगे


Updated On: 2015-10-06 17:14:53 जाति व्यवस्था का दंश : दलित उत्पीडऩ के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे आगे

सदियों से जाति व्यवस्था की बेडिय़ों में कैद दलित आज भी अत्याचारों के शिकार हैं। नेशनल क्राइम रिकाड्र्स ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा हाल ही में जारी आंकड़े इन तथ्यों की पुष्टि करते हैं। दलितों पर अत्याचार के मामले में सबसे खराब हालत उत्तर प्रदेश की है।

इस प्रदेश में दलितों की आबादी (4.13 करोड़) अन्य सभी राज्यों से अधिक है। इसलिए इस राज्य में अपराध के आंकड़े भी अधिक रहते हैं।

एनसीआरबी के मुताबिक वर्ष 2014 में उत्तर प्रदेश में दलितों के खिलाफ अपराध की 8075 घटनाएं हुईं, जो कि देश में दलितों के खिलाफ घटित अपराध (47,064) का 17.2 फीसदी है।

इस अवधि के दौरान उत्तर प्रदेश में 245 दलितों की हत्याएं हुईं, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी 744 घटनाएं हुईं। इस साल उत्तर प्रदेश में अपहरण के 383 मामले हुए, जो कि इस अवधि में पूरे देश में दलितों के खिलाफ घटित कुल अपराध (758) का 51 फीसदी था।

इस अवधि में उत्तर प्रदेश में दलित महिलाओं को विवाह के लिए विवश करने के इरादे से 270 अपहरण हुए थे, जोकि राष्ट्रीय स्तर पर दलितों के विरुद्ध घटित इन मामलों की संख्या (427) का 63 फीसदी थी।

वर्ष 2014 के दौरान उत्तर प्रदेश में दलित महिलाओं से बलात्कार की 459 घटनाएं हुईं, जो कि राष्ट्रीय स्तर पर दलितों के विरुद्ध घटित कुल अपराध (225) का 20 फीसदी था। इससे साफ है कि दलित महिलाओं पर बलात्कार के मामले काफी अधिक हैं।

उपरोक्त अवधि में उत्तर प्रदेश में दलित महिलाओं से बलात्कार के प्रयास के 32 मामले दर्ज हुए, जो कि राष्ट्रीय स्तर पर दलितों के विरुद्ध हुए कुल अपराध का 36 फीसदी था। इसी तरह यूपी में दलित महिलाओं को निर्वस्त्र करने के 32 मामले हुए, जो कि राष्ट्रीय स्तर पर दलितों के खिलाफ हुए इस तरह के मामलों का 22 फीसदी था।

इस साल उत्तर प्रदेश में दलितों के विरुद्ध बलवे के 342 मामले हुए, जो कि राष्ट्रीय स्तर पर घटित कुल अपराध (1147) का 30 फीसदी था।

एनसीआरबी के इन आंकड़ों से साफ है कि साल 2014 में उत्तर प्रदेश में दलितों के खिलाफ हुई घटनाएं, खास तौर पर हत्या और महिलायों के विरुद्ध गंभीर अपराध की स्थिति बहुत खराब है, क्योंकि इसकी दर राष्ट्रीय स्तर पर घटित अपराध से बहुत ज्यादा है।

दलितों पर अपराध के उपरोक्त आंकड़े वह हैं, जो पुलिस द्वारा लिखे गए हैं। हालांकि वास्तविकता यह है पुलिस में जो अपराध लिखे जाते हैं, वे कुल घटित अपराध का थोडा हिस्सा ही होते हैं, क्योंकि यह सर्वविदित है कि दलित तथा अन्य कमजोर वर्गों पर घटित होने वाले अधिकतर अपराध तो दर्ज ही नहीं किए जाते। इस का एक मुख्य कारण है कि पुलिस अधिकारियों की जातिवादी मानसिकता और दूसरा है अपराध के आंकड़ों को कम करके दिखाना।

2014 में दलितों के जो मामले ऊपर दिखाए गए हैं, उनमें 1500 मामले धारा 156(3) दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत अदालत के आदेश से दर्ज किए गए थे, क्योंकि इनको पुलिस ने थाने पर दर्ज करने से मना कर दिया था। बहुत से मामले ऐसे होते हैं, जिन में लोग विभिन्न कारणों से थाने पर लिखाने ही नहीं जाते हैं।

(साभार : एसआर दारापुरी, रिटा. आईपीएस)

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