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किताब में जातिवाद की शर्मनाक कहानी


Updated On: 2017-09-13 18:43:33 किताब में जातिवाद की शर्मनाक कहानी

हाल ही में पुणे से एक खबर आई कि एक महिला वैज्ञानिक ने अपनी नौकरानी पर मुकदमा दर्ज करवाया कि उसने मराठा होकर फर्जी पंडिताइन बन कर उसके घर मे खाना बनाया, जिससे असली पंडिताइन, जो कि वैज्ञानिक है, उसका धर्म भ्रष्ट हो गया, भारतीय दंड संहिता की धारा 419 एवं 504 के तहत मराठा नौकरानी पर प्रकरण बनाया गया है, जिसकी जांच जारी है।

इस खबर से यह साबित होता है कि आज भी भारतीय सवर्ण समाज में जातिवाद, छुआछूत और भेदभाव भयंकर रूप में हावी है तथा चाहे कोई वैज्ञानिक ही क्यों न हो, उसकी मानसिकता उतनी ही दूषित, मैली, कूपमण्डूक और अवैज्ञानिक ही बनी रहती है।

दुख की बात है कि आज भी एक मराठा नौकरानी को छद्म ब्राह्मणी बनकर रसोइये की नौकरी करनी पड़ती है और पकड़े जाने पर मुकदमा झेलना पड़ता है। शर्म आती है ऐसी जातिवादी सोच की वैज्ञानिक पर और उस व्यवस्था पर जो ऐसे हास्यास्पद मामलों में मुकदमे दर्ज कर लेती है और उनकी जांच भी करती है, दलितों के खिलाफ निकलने वाले मराठा मोर्चे इस अपमानजनक घटना पर मूक बने रहते हैं।

आखिर भारत की महान संस्कृति में ऐसी घटिया मानसिकता निर्मित कहां से होती है? भारत के सवर्णों को ऐसा अवैज्ञानिक छुआछूत सिखाता कौन है ? यह भेदभाव की मानसिकता किसी फैक्ट्री में बनती है या किसी खेत में उगती है ? शायद यह दूषितपन यहां की संस्कृति और संस्कार का हिस्सा है।

यह मानसिकता अनपढ़ ग्रामीणों से लेकर कुपढ़ वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, वकीलों आदि इत्यादि सब में पाई जाती है और यह यहां की सभ्यता, संस्कृति व साहित्य में भी घनघोर रूप में व्याप्त है।

ऐसी ही जातिवादी मानसिकता के धनी एक लेखक गोविंद अग्रवाल ने अपनी मैली, घृणित विचार शैली का प्रदर्शन किया है। उनकी लिखी किताब राजस्थानी लोककथाएं में उन्होंने एक कहानी लिखी है -चमारी बामणी बणी, जिसे राजस्थानी ग्रन्थागार, जोधपुर ने छापा है।

इस कहानी को पढि़ए...पहाड़ी की घाटी में एक बुढिय़ा ब्राह्मणी रहा करती थी। वह यात्रियों के लिए खाना बना दिया करती थी। वह मर गई तो एक चमारी ने सोचा कि क्यों न मैं बुढिय़ा का स्थान ले लूं ? अच्छी आय के साथ-साथ सम्मान भी मिलेगा! ...एक दिन दो दर्शनार्थी आए, उनके लिए काचरों की साग व रोटी बनाई...यात्रियों ने सराहना की...ब्राह्मणी माई तूने साग तो बहुत अच्छी बनाई...तब उसने कहा...आज मेरी रांपी (चमारों का औजार) नहीं मिली। इसलिए दांत से काट कर काचरों का साग बनाया...सुनकर यात्री सन्न रह गए और उन्हें निश्चय हो गया कि औरत ब्राह्मणी नहीं चमारी है।

यह किताब राजस्थानी के प्रतिष्ठित कहे जाने वाले प्रकाशन ने प्रकाशित ही नहीं की, बल्कि इस कहानी को कार्ड पेपर पर बाकायदा लेमिनेटेड करके अपने सूची पत्र के साथ राजस्थान के हर स्कूल तथा कॉलेज में भी भिजवाया है, ताकि वहां के पुस्तकालयों में इस तरह का जातिवादी भेदभाव वाला साहित्य रखा जा सके और उसे हर विद्यार्थी पढ़े।

जैसे ही इसकी भनक मिली है लेखक गोविंद अग्रवाल तथा प्रकाशक राजस्थानी ग्रन्थागार का उनकी इस कुत्सित सोच के लिए कड़ी निंदा हो रही है तथा राजस्थान के दलित बहुजन संगठनों ने राज्य सरकार से यह मांग की है कि इस पुस्तक पर तुरंत रोक लगाई जाए और लेखक तथा प्रकाशक के विरुद्ध कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए, अन्यथा आंदोलन किया जाएगा।

पुणे की घटना और राजस्थान में चल रहा यह प्रकरण साबित करता है कि पिछड़े और दलित वर्ग के प्रति आज भी भारतीय सवर्ण समाज कैसी सोच रखता है ?

वाकई गोविंद अग्रवाल जैसे लेखक और राजस्थानी ग्रन्थागार जैसे प्रकाशक इस तरह खुलेआम जातिवाद फैलाने और वर्ग विशेष के प्रति घृणा पैदा करने के जुर्म में जेल जाने के हकदार हैं। उम्मीद है कि सरकार इस पर ध्यान देगी, नहीं देगी तो अंबेडकरवादी लोग उन्हें जरूर सबक सिखाएंगे ही।

-साभार भंवर मेघवंशी
(लेखक शून्यकाल के संपादक हैं)

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