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पंजाब...जहां टुकड़े-टुकड़े कर मारे जा रहे दलित


Updated On: 2017-06-12 22:08:23 पंजाब...जहां टुकड़े-टुकड़े कर मारे जा रहे दलित

2011 की जनगणना के मुताबिक, पंजाब की करीब 32 फीसदी आबादी दलित वर्ग से संबंधित है। मतलब कि प्रदेश में हर तीसरा शख्स दलित है। इतनी बड़ी आबादी के बावजूद यहां इस वर्ग के लोगों पर बेइंतहा जुल्म हो रहे हैं। 

मानसा के गांव बुर्ज झब्बर के बंत सिंह के जमींदारों द्वारा हाथ-पैर काट देना, लुधियाना में दो दलित भाइयों की फर्जी एनकाउंटर में गोलियां मारकर हत्या, अबोहर में भीम टांक नामक दलित नौजवान के हाथ-पैर काटकर बेरहमी से कत्ल, मानसा में दलित युवक सुखचैन का कत्ल करके उसकी टांग काट साथ ले जाना, फिरोजपुर में खेत से मक्की तोडऩे पर दलित नौजवान सुखदेव को गोली मार देना, मुक्तसर में दलित युवक अजय कुमार का सिर काटकर धड़ से अलग करना, संगरूर के झलूर गांव में अपने हिस्से की जमीन के लिए संघर्ष करने वाले दलितों पर जानलेवा हमला व बुजुर्ग महिला की हत्या...। ये वो खौफनाक घटनाएं हैं, जो कि बताती हैं कि पंजाब के दलित कितने सुरक्षित हैं।

प्रदेश में दलितों पर जुल्म बढऩे की गवाही सरकारी रिकॉर्ड भी बयां करता है। एक अखबार की खबर के मुताबिक, पंजाब के एससी कमिशन का रिकॉर्ड बताता है कि साल 2007 से 2016 (अकाली-भाजपा सरकार के दौरान) के बीच पंजाब में दलितों के खिलाफ अत्याचार के 8058 मामले सामने आए हैं, जिनमें संगीन अपराध भी शामिल हैं।

दलितों से भेदभाव या अन्य ज्यादतियां होने की अन्य 5 हजार से अधिक घटनाओं को अलग तौर पर दर्ज किया गया है। इन घटनाओं में हर साल बढ़ोतरी हो रही है। इनके अतिरिक्त अत्याचार की कई और घटनाएं ऐसी भी हुईं, जो कि पुलिस तक पहुंची ही नहीं।

पंजाब में कांग्रेस सरकार (2002 से 2007 तक) के दौरान 2004 में दलितों के खिलाफ अत्याचारों के 236, साल 2005 में 329 और साल 2006 में 573 मामले सामने आए। इसके बाद प्रदेश में अकाली-भाजपा की सरकार बनी, लेकिन जुल्म कम होने की बजाय और बढ़ता चला गया। 2007 में दलितों पर अत्याचारों के 473, 2008 में 322, साल 2009 में 517, 2010 में 788, साल 2011 में 745 मामले दर्ज हुए।

इसके बाद साल 2012 के विधानसभा चुनाव में अकाली-भाजपा फिर सत्ता पर काबिज होने में सफल रही। इसी साल से दलितों के खिलाफ अपराधों में एकदम बढ़ोतरी होने लगी। साल 2012 में 1055, 2013 में 1299, 2014 में 1232 व साल 2015 में अत्याचारों की 1278 घटनाएं दलितों के खिलाफ हुईं।

एससी कमिशन के मुताबिक, अकाली-भाजपा सरकार के कार्यकाल के दौरान 5 हजार से अधिक मामले ऐसे रहे, जिनमें दलितों पर अत्याचारों के अतिरिक्त जाति-पाति के आधार पर भेदभाव की घटनाएं हुईं। अब प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद कांग्रेस की सरकार बनी है, लेकिन दलितों के खिलाफ अत्याचार की घटनाएं बदसतूर जारी हैं। प्रदेश में सरकार चाहे कांग्रेस की रही हो या फिर अकाली-भाजपा की, दलितों के खिलाफ जुल्म रुकने की बजाय बढ़ता चला गया है।

अंबेडकर सेंटर, पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ के पूर्व निदेशक प्रो. मनजीत सिंह अपने लेख में लिखते हैं कि पंजाब में जाति की जड़ें धर्मों व अन्य मानवतावादी लहरों के मुकाबले कहीं ज्यादा गहरी व उलझन भरी हैं। यही कारण है कि प्रदेश के गांवों में जातियों के आधार पर बने गुरुद्वारे बड़ी गिनती में दिखाई देने लगे हैं। अनेक गांव ऐसे हैं, जहां धर्मशालाएं या श्मशानघाट भी जाति के आधार पर हैं। इससे स्पष्ट है कि जातिवाद की पकड़ पंजाब के गांवों व शहरों में अभी भी काफी मजबूत है।

प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में दलितों की जनसंख्या 37 फीसदी है, जबकि 40 फीसदी गांव ऐसे हैं, जहां दलितों की आबादी 40 फीसदी से अधिक है। अधिकतर दलित परिवारों का जीवन मध्यकालीन युग के गुलामों से कोई बेहतर नहीं है। इसका मुख्य कारण मनुवादी विचारधारा का हमारे समाज में गहरी जड़ें जमाना है।

वह लिखते हैं कि बीते समय के दौरान दलित नौजवानों के जो कत्ल हुए हैं, बेशक वह लुधियाना के दो दलित भाइयों को गोली मारने की घटना हो या अबोहर में भीम टांक को शरीर के टुकड़े करके मार देने की या फिर घरांगना में सुखचैन सिंह पाली की टांगें काटकर मार देने की दिल दहला देने की घटना हो, इन सारे मामलों में ऊंची जाति के प्रभावशाली घरानों के लोगों ने अपने राजनीतिक प्रभाव का प्रयोग करके इतने बड़े जुल्म को अंजाम देने की हिम्मत की।

पंजाब के दलितों में स्वाभिमानी नौजवानों की एक पीढ़ी भी उभरकर कर सामने आ रही है। बेशक ये नौजवान आर्थिक तौर पर कमजोर हैं, लेकिन वे ऊंची जातियों की धौंस को चुनौती देने का मन बनाए बैठे हैं। इन सभी हत्याओं में यह देखने को मिला कि ऊंची जातियों के लोग दलित नौजवानों के प्रभाव को किसी भी कीमत पर स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं।

यही कारण है कि उन्होंने दलित नौजवानों को इतनी बेरहमी से टुकड़े-टुकड़े करके मारा, ताकि अन्य में भी दहशत फैलाई जा सके। अफसोस! बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर की बदौलत आरक्षण का राजनीतिक लाभ उठाकर मंत्रियों के पदों पर पहुंचने वाले नेता इस जुल्म के खिलाफ जितनी बड़ी गिनती में सडक़ों पर रोष व्यक्त करते नजर आने चाहिए थे, वे गिनती में नहीं दिखाई दिए।

दलितों के खिलाफ अत्याचार की बड़ी घटनाएं

कबड्डी खिलाड़ी दो भाइयों की गोलियां मारकर हत्या
साल 2014 में लुधियाना के अंतर्गत जमालपुर गांव में कबड्डी खिलाड़ी दो दलित भाइयों हरिंदर (23) व जतिंदर (25) की गोलियां मारकर हत्या कर दी गई। इस मामले में पुलिस पर फर्जी एनकाउंटर करने का आरोप लगा। वहीं उस समय की सत्ताधारी पार्टी अकाली दल के एक नेता भी इस मामले में आरोपों के घेरे में आ गए।

फिरोजपुर में खेत से भुट्टा तोडऩे पर गोली मारी
फिरोजपुर के गांव ईशेवाला के रहने वाले सुखदेव (18) की मई, 2016 में गोली मार कर हत्या कर दी गई। इस नौजवान का कसूर सिर्फ इतना था कि उसने एक खेत से मक्की का भुट्टा तोड़ लिया था। इसी बात भडक़े जमींदार ने उसे गोली मार दी। सुखदेव का परिवार मजदूरी करके गुजारा करता था।

अकाली नेता के फार्महाउस में हाथ-पैर काटकर कत्ल
अबोहर में 11 दिसंबर, 2015 को उस समय की सत्ताधारी पार्टी से संबंधित अकाली नेता के फार्महाउस में दलित नौजवान भीम टांक की बेरहमी से हत्या कर दी गई। उसकी टांगें और बाजू शरीर से अलग कर दिए गए। मीडिया रिपोट्र्स के मुताबिक, भीम टांक पहले शराब कारोबारी अकाली नेता के पास काम करता था, लेकिन बाद में उसने यहां काम करना छोड़ दिया था। आरोप है कि इसी रंजिश में उसका कत्ल किया गया।

हत्या के बाद टांग काटकर साथ ले गए
मानसा के गांव घरांगना में 10 अक्टूबर, 2016 की रात को किडनैप किए जाने के बाद दलित नौजवान सुखचैन सिंह (20) की हत्या कर दी गई। ऊंची जाति के कुल 6 आरोपियों में से 2 आरोपी अकाली नेताओं के नजदीकी थे, जो कि सुखचैन की टांग को काटकर साथ ले गए। शराब तस्करी करने वाले आरोपियों को शक था कि सुखचैन उनके गैरकानूनी धंधे की खबर पुलिस को देता है।

सिर धड़ से अलग किया, उंगलियां काटीं
मुक्तसर में रहने वाले दलित नौजवान अजय कुमार (18) की 7 अक्टूबर को बूड़ा गुज्जर रोड पर लाश मिली, जिसका सिर धड़ से अलग किया गया था। हाथ की उंगलियां कटी हुई थीं। आरोप है कि नेता के करीबी कुछ लोग अजय को नाजायज शराब बेचने के लिए मजबूर करते थे। अजय की ओर से शराब बेचने से इंकार किए जाने के बाद उसका कत्ल कर दिया गया।

जमीन के लिए संघर्ष करने वाले दलितों पर जानलेवा हमला
संगरूर जिले के गांव जलूर में अपने हिस्से की पंचायती जमीन को लेकर संघर्ष करने वाले दलितों पर 5 अक्टूबर, 2016 को प्रभावशाली जमींदारों ने हमला किया। इसमें 70 साल की एक दलित महिला गुरदेव कौर की मौत हो गई। इस घटना के बाद गांव के 50 फीसदी से अधिक दलित यहां से पलायन कर गए। इस गांव के दलित आज भी जमीन के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

दुष्कर्म के आरोपियों को सजा दिलाने पर हाथ-पैर काट दिए
मानसा के गांव बुर्ज झब्बर के रहने वाले बंत सिंह ने जाति के आधार पर होने वाले जुल्म के खिलाफ अपने गीतों के जरिये आवाज बुलंद की। हालांकि इसके बाद उनके लिए मुश्किलों भरा रास्ता शुरू हो गया। साल 2000 में उनकी लडक़ी के साथ प्रभावशाली लोगों ने दुष्कर्म किया। बंत सिंह ने आरोपियों के खिलाफ केस लड़ा और 2004 में मानसा सेशन कोर्ट से उन्हें सजा दिलवाकर ही दम लिया। हालांकि इससे उनकी मुश्किलें कम नहीं हुईं। साल 2006 के जनवरी महीने में प्रभावशाली जमींदारों ने उन पर जानलेवा हमला किया और उनकी दोनों बाजुएं व टांगें काट दीं। बंत सिंह ने अपने अंग गंवाने के बाद भी हौसला नहीं छोड़ा और हमलावरों को 2008 में अदालत से सजा दिलवाकर ही दम लिया।

(Our View Desk)

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