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81% एससी-एसटी और 80% ओबीसी महिलाएं चाहती हैं घर में बेटी पैदा हो


Updated On: 2018-01-25 18:23:52 81% एससी-एसटी और 80% ओबीसी महिलाएं चाहती हैं घर में बेटी पैदा हो

भारत में हाल ही में हुए एक सर्वे के आंकड़ों में यह सामने आया है कि देश के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में संतान के रूप में लोगों के अंदर बेटियों की चाहत में बढ़ोतरी हुई है।

नेशनल फैमिली एंड हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक बेटियों को लेकर भारतीय समाज की सदियों पुरानी सोच में सकारात्मक बदलाव देखने को मिला है।

सर्वे के अनुसार 15 से 49 साल की 79 फीसदी महिलाओं और 15 से 54 वर्ष के 78 फीसदी पुरुषों ने अपनी संतान के रूप में एक बेटी की चाहत को स्वीकारा है।

खास बात यह है कि बेटी की इच्छा रखने वाले लोगों में अनुसूचित जाति, जनजाति, मुस्लिम और ग्रामीण क्षेत्रों के अलावा आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है।

सर्वे के मुताबिक गरीबी रेखा से नीचे के तबके और निम्न मध्वर्गीय परिवारों की 86 फीसदी महिलाएं और 85 फीसदी पुरुष बेटियों के जन्म को लेकर सबसे ज्यादा सहज और उत्साहित पाए गए।

वहीं मुस्लिम, दलित और आदिवासी समुदायों के परिवारों ने बाकी समुदायों के मुकाबले घर में बेटी के पैदा होने को काफी अच्छा बताया है।

यदि हम बात साल 2005-06 के आंकड़े की करें तो बेटियों की चाहत केवल 74 फीसदी महिलाओं और 65 फीसदी पुरुषों को ही थी।

गौरतलब है कि बेटियों के प्रति महिलाओं की बढ़ती चाहत की वजह शिक्षा के बढ़ते स्तर को भी माना गया है। 12वीं पास 85 फीसदी महिलाओं ने जहां बेटी पैदा होने को जरूरी माना है, वहीं इससे कम शिक्षित 72 फीसदी महिलाओं ने भी घर में बेटी की महत्ता को समझा है।

वहीं पुरुष समाज में 74 फीसदी पढ़े-लिखे और 83 फीसदी कम शिक्षित पुरुषों ने भी संतान के तौर पर बेटियों को पहली पसंद बताया है।

मुस्लिम, दलित और गरीब बेटी के लिए सबसे आगे
सर्वे के मुताबिक लगभग 81 फीसदी मुसलमान परिवारों ने घर में बेटियों का होना बेहद जरूरी माना है, जबकि 79 फीसदी बौद्ध धर्म के लोग और 79 फीसदी हिंदू महिलाओं का मानना है कि घर में कम से कम एक बेटी जरूर होनी चाहिए।

अगर जातीय समुदाय की बात करें तो 81 फीसदी दलित, 81 फीसदी आदिवासी और 80 फीसदी ओबीसी परिवारों की महिलाओं ने बेटी की चाहत जाहिर की है। साथ ही 84 फीसदी आदिवासी पुरुष और 79 फीसदी दलित पुरुष भी बेटी की मंशा पाले हुए हैं।

वहीं अगर आर्थिक स्तर पर बेटियों की चाहत की बात करें तो 86 फीसदी गरीब महिलाएं और 85 फीसदी पुरुष कम से कम एक बेटी चाहते हैं, जबकि अमीरों में यह प्रतिशत 73 और 72 फीसदी का है।

अब भी बेटों की चाह बरकरार
रिपोर्ट में बेटे की इच्छा को लेकर भी सवाल किया गया था, जिसमें ये बात सामने निकल कर आई कि बेटों की चाहत अब भी बेटी से ज्यादा है। लगभग सभी कैटगरी में 82 फीसदी महिलाएं और 83 फीसदी पुरुष परिवार में कम से कम एक बेटा चाहते हैं।

इसके अलावा, महिलाओं और पुरुष दोनों वर्ग में लगभग 19 फीसदी लोगों ने बेटियों की तुलना में बेटे की चाह ज्यादा जाहिर की है, जबकि केवल 3.5 फीसदी ही ऐसे लोग थे, जिन्हें बेटों की तुलना में अधिक बेटियां चाहिए।

वहीं देश के दो बड़े राज्य बिहार की 37 फीसदी और यूपी की 31 फीसदी महिलाएं अब भी बेटों को बेटियों से ज्यादा ज़रूरी समझती हैं।

बेशक हमारे देश में अब लोगों ने बेटियों की चाहत को महसूस करना शुरू कर दिया है, मगर अब भी समाज के कुछ वर्ग इससे अछूते हैं।
(साभार : ह्यूमन जंक्शन)

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