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मोदी सरकार के बजट में एससी-एसटी का शिक्षा फंड घटाया


Updated On: 2019-07-12 14:23:24 मोदी सरकार के बजट में एससी-एसटी का शिक्षा फंड घटाया

मोदी सरकार द्वारा पेश किए गए 2019-20 के बजट से एससी-एसटी वर्ग एक बार फिर अनदेखी के शिकार हुए हैं। इस संबंध में आई मीडिया रिपोट्र्स और दलित अधिकारों से जुड़ी संस्था की पड़ताल में यह बात सामने आई है। रिपोट्र्स के मुताबिक, मोदी सरकार के इस बजट में दलितों और गरीबों की अनदेखी की गई है। यहां तक कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा बजट पेश करते हुए दिए गए भाषण में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति शब्द का जिक्र सिर्फ एक बार ही किया गया।

नेशनल कैंपेन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स (एनसीडीएचआर) के बीना पलिकल ने केंद्रीय बजट 2019-20 का विश्लेषण कर कहा है कि मोदी सरकार के दौरान आदिवासियों और दलितों के विकास में खर्च की जाने वाली राशि में कटौती की गई है।

पीएचडी और इसके बाद के कोर्सेज के लिए फेलोशिप और स्कॉलरशिप में 2014-15 से लगातार गिरावट आई है। साथ ही यूजीसी और इग्नू में एससी और एसटी वर्गों के विद्यार्थियों के लिए हायर एजुकेशन फंड्स में क्रमश: 23 प्रतिशत और 50 प्रतिशत की कमी की गई है।

एनसीडीएचआर के मुताबिक, केंद्रीय बजट में एससी और एसटी विद्यार्थियों के प्री-मेट्रिक और पोस्ट मेट्रिक स्कॉलरशिप पर खर्च होने वाले फंड में कटौती कर दी गयी है।

एनसीडीएचआर के बीना पलिकल के मुताबिक एससी स्टूडेंट्स को मेट्रिक के बाद मिलने वाली स्कॉलरशिप के लिए इस साल बजट में 2926 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जबकि पिछले साल यह रकम 3 हजार करोड़ रुपये थी। पलिकल के मुताबिक, एसटी स्टूडेंट्स के लिए मेट्रिक के बाद मिलने वाली स्कॉलरशिप के मद में 2018-19 में 1,643 करोड़ रुपये के फंड का प्रावधान था, जो इस साल 1,613 करोड़ रुपये है।

नेशनल कैंपेन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स ने यह भी कहा है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में पीएचडी और इसके बाद के कोर्सेज के लिए फेलोशिप और स्कॉलरशिप में 2014-15 से लगातार गिरावट आई है। एससी के लिए यह रकम 602 करोड़ रुपये से घट कर 283 करोड़ रुपये हो गई, जबकि एसटी स्टूडेंट्स के लिए यह 439 करोड़ रुपये से कम होकर 135 करोड़ रुपये हो गई। इसी प्रकार से यूजीसी और इग्नू में एससी और एसटी वर्गों के विद्यार्थियों के लिए हायर एजुकेशन फंड्स में क्रमश: 23 और 50 फीसदी की गिरावट हुई।

एनसीडीएचआर ने यह दावा भी किया है कि समाजिक कल्याण और अधिकारिता मंत्रालय को आवंटित फंड में भी कमी कर दी गई है। एससी-एसटी की भलाई स्कीमें इसी विभाग के तहत चलाई जाती हैं।

मोदी सरकार द्वारा अगले 5 साल में देश को 5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखा गया, लेकिन सवाल यह है कि उस अर्थव्यवस्था में एससी-एसटी की स्थिति क्या होगी और उनकी हिस्सेदारी कितनी होगी? देश की बढ़ती इकोनॉमी का लाभ सभी तक, खासतौर पर दलितों तक नहीं पहुंच पाया है। देश के अधिकतर संसाधनों पर मुट्ठी भर कुछ लोगों का कब्जा है।

केंद्रीय बजट ने नरेन्द्र मोदी सरकार के इरादे स्पष्ट कर दिए हैं। मोदी सरकार सरकारी संस्थानों को प्राइवेट हाथों में देने की कोशिशों में लगी है। एससी, एसटी, ओबीसी वर्गों के लोग इसे आरक्षण व्यवस्था को कमजोर करने का कदम मानते हैं।

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