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एससी-ओबीसी छात्रों के संघर्ष की जीत, यूनिवर्सिटी से निलंबन रद हुआ


Updated On: 2019-10-14 13:16:39 एससी-ओबीसी छात्रों के संघर्ष की जीत, यूनिवर्सिटी से निलंबन रद हुआ

महाराष्ट्र के वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी यूनिवर्सिटी के एससी-ओबीसी वर्गों के छात्रों के संघर्ष की आखिर जीत हुई है। 3 एससी और 3 ओबीसी समाज के छात्रों को बीते दिनों निष्कासित कर दिया गया था। इस फैसले का छात्रों के साथ-साथ एससी-ओबीसी समाज के लोगों ने भारी विरोध किया था, जिसके बाद यूनिवर्सिटी ने इन छात्रों के निलंबन के फैसले को वापस ले लिया है। 

बहुजन समाज से संबंधित इन छात्रों का कहना था कि वे यूनिवर्सिटी परिसर में बहुजन नायक साहब कांशीराम का परिनिर्वाण दिवस मनाना चाहते थे, लेकिन यूनिवर्सिटी प्रशासन ने इससे रोक दिया।

बहुजन समाज के छात्रों ने देश में दलितों-मुसलमानों के खिलाफ हो रहीं मॉब लिंचिंग की घटनाओं, कश्मीर में घरों में कैद लोगों, एनआरसी कानून के नाम पर मुस्लिमों को टारगेट करने, यौन हिंसा की घटनाओं आदि मामलों को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र भी लिखे। इसके बाद यूनिवर्सिटी प्रशासन की ओर से बहुजन समाज के 6 छात्रों के खिलाफ कार्रवाई की गई थी।

इन छात्रों का कहना था कि उन्हें साहब कांशीराम का परिनिर्वाण दिवस मनाने और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चिट्ठी लिखने से कैसे रोका जा सकता है। निष्कासित किए गए छात्र नेताओं में चंदन सरोज, रजनीश कुमार अंबेडकर, वैभव पिम्पलकर, राजेश सारथी, नीरज कुमार एवं पंकज बेला के नाम शामिल थे।

बताया जा रहा है कि छात्रों ने यूनिवर्सिटी प्रशासन द्वारा रोके जाने के बावजूद मान्यवर कांशीराम जी का परिनिर्वाण दिवस मनाया और पीएम मोदी को खत लिखा था। खबरों के मुताबिक, हिंदी यूनिवर्सिटी प्रशासन ने छात्र-छात्राओं को बहुजन नायक कांशीराम के परिनिर्वाण दिवस मनाने की अनुमति नहीं दी।

9 अक्टूबर को छात्र यूनिवर्सिटी के कुलसचिव कार्यालय परिनिर्वाण दिवस पर कार्यक्रम आयोजित करने के लिए अनुमति लेने गए तो छात्रों को आधे घंटे तक कार्यालय में बिठाए रखा गया और अंत में उन्हें कार्यक्रम आयोजित करने की इजाजत नहीं दी गई। इससे पूर्व 7 अक्टूबर को छात्र-छात्राओं ने देश के मौजूदा हालात पर पीएम मोदी को सामूहिक पत्र लेखन करने के लिए भी यूनिवर्सिटी प्रशासन को सूचित किया था।

निष्कासित बहुजन छात्र नेताओं ने यूनिवर्सिटी के कुलपति पर दलित विरोधी-मनुवादी व तानाशाह होने का आरोप लगाते हुए कहा था कि यूनिवर्सिटी में आरएसएस को नियमित शाखा लगाने की खुली छूट दे दी गई, लेकिन दलित-बहुजन व लोकतंत्र पसंद-न्याय पसंद छात्र-छात्राओं को अपने नायकों तक को श्रद्धांजलि देने पर निष्कासित किया जा रहा है। जबकि यूनिवर्सिटी में संघ-बीजेपी से जुड़े नेताओं की जयंती व पुण्य तिथि पर कार्यक्रम आयोजित करने की खुली छूट दे रखी है और इन कार्यक्रमों में कुलपति आए दिन स्वयं कार्यक्रम की शोभा बढ़ाते व मंच शेयर करते नजर आते हैं।

इस मामले को लेकर सोशल मीडिया पर यूनिवर्सिटी प्रशासन की जमकर आलोचना हुई थी। बहुजन समाज के लोगों ने इस मामले पर रोष व्यक्त किया था। इसके बाद यूनिवर्सिटी प्रशासन ने अपने फैसले को वापस ले लिया है।
यूनिवर्सिटी के कार्यकारी पंजीयक कादर नवाज खान ने 13 अक्टूबर को अपने आदेश में कहा कि तकनीकी विसंगतियों और छात्रों के साथ नैसर्गिक न्याय को देखते हुए निष्कासन रद कर दिया गया है।

इस मामले को लेकर निष्कासित होने वाले छात्र रजनीश कुमार अंबेडकर अपनी फेसबुक वॉल पर लिखते हैं-विश्वविद्यालय ने हमारा निष्कासन वापस लेने की घोषणा की है। हम देशभर के उन सभी संविधानवादी और प्रगतिशील लोगों के आभारी हैं, जिन्होंने इस लड़ाई में हमारा साथ दिया। हम उन सभी मीडिया संस्थानों, अखबार, न्यूज चैनल, ब्लॉग, वेबसाइट आदि के प्रति शुक्रगुजार हैं, जिन्होंने सामाजिक न्याय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई और हमारी आवाज को राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाया। आप सभी मित्रों-शुभचिंतकों के समर्थन से हमें बहुत बल मिला है।

हम विश्वविद्यालय प्रशासन के प्रति भी आभारी हैं, जिन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ और हमारा निष्कासन वापस लिया गया।

हम संवैधानिक मूल्यों में गहरा विश्वास रखते हैं और हम कोई भी ऐसा काम नहीं करते, जो संविधान विरोधी और गैरलोकतांत्रिक हो। विश्वविद्यालय की बेहतरी के लिए भी हम हमेशा से संकल्पित रहे हैं, लेकिन किसी के साथ अन्याय-अत्याचार होता है और जनतांत्रिक हितों का हनन होता है तो हम जरूर उसका संविधान सम्मत प्रतिरोध करते हैं और आगे भी करते रहेंगे।

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