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गांव में दाखिल होते ही दलितों को चप्पलें उतारनी पड़ती हैं!


Updated On: 2019-07-08 09:02:35 गांव में दाखिल होते ही दलितों को चप्पलें उतारनी पड़ती हैं!

भारतीय संविधान में समानता, स्वतंत्रता और शोषण के विरुद्ध अधिकार की व्यवस्था की गई है। हमारा संविधान देश के हरेक नागरिक को समान मानता है, लेकिन अगर देश के गांवों-कस्बों पर नजर मारें तो जमीनी हालात अलग नजर आते हैं। ऐसा लगता है कि जैसे जातिवाद में उलझे इन क्षेत्रों में संविधान नहीं, बल्कि मनुस्मृति लागू है। जाति व्यवस्था के तहत सबसे निचले दर्जे पर रखे गए दलित आज भी अमानवीय व्यवहार और अत्याचारों की पीड़ा झेल रहे हैं।

कर्नाटक के मैसूर के अंतर्गत रत्तेहाली गांव का भी ऐसा ही मामला सामने आया है। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, इस गांव में दलित जाति उत्पीडऩ के शिकार हैं। मैसूर डिस्ट्रिक्ट विजिलेंस एंड अवेयरनेस कमेटी मेंबर पुत्तूलक्ष्मी कहती हैं कि उच्च जाति के लोगों की ओर से गांव में दलितों को चप्पल-जूते पहनने की मनाही की गई है। दलितों को चप्पल पहनने से रोका जाता है। उन्हें नंगे पांव चलना पड़ता है।

पुत्तूलक्ष्मी के मुताबिक, गांव में जाति भेदभाव जोरों पर है। दलितों को उच्च जाति के लोगों के आगे झुकने के लिए मजबूर किया जाता है। यहां तक कि दलितों को उच्च जाति के लोगों के रेस्टोरेंट और सैलून में भी दाखिल नहीं होने दिया जाता। यह मामला 7 जुलाई को मैसूर डिस्ट्रिक्ट विजिलेंस एंड अवेयरनेस कमेटी की बैठक में भी उठा, जिसकी अध्यक्षता डीसी अभिराम जी शंकर ने की।

बीते समय में भी यह गांव जातिवाद को लेकर खूब चर्चा में रह चुका है। खबर के मुताबिक, बीते समय में उच्च जाति के लोगों ने राशन डिपो से सामान खरीदने से इनकार कर दिया था, क्योंकि इस पीडीएस शॉप का लाइसेंस दलित के पास था। इसे लेकर काफी प्रदर्शन हुए। बाद में अधिकारियों ने गांव में एक और राशन की दुकान खोलने की अनुमति दे दी, जिसे उच्च जाति का व्यक्ति चलाता है।

पुत्तूलक्ष्मी के मुताबिक, गांव में राशन डिपो का असल लाइसेंस जिस दलित के पास है, वह राशन डिपो चलाने के लिए मुश्किलों को सामना कर रहा है, क्योंकि सिर्फ दलित परिवार ही उसकी दुकान से सामान खरीद रहे हैं। दलितों की आबादी इस गांव में ज्यादा नहीं है।

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