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पंजाब : बदहाल शिक्षा में गुम होता दलितों, पिछड़ों, गरीबों के बच्चों का भविष्य


Updated On: 2017-06-10 15:39:09 पंजाब : बदहाल शिक्षा में गुम होता दलितों, पिछड़ों, गरीबों के बच्चों का भविष्य

शिक्षा वह बुनियाद है, जिस पर बच्चों का भविष्य टिका होता है। अगर यह बुनियाद ही कमजोर होगी तो भविष्य का अंधकारमय होना तय है। विकसित प्रदेश के तौर पर पेश किए जाने वाले पंजाब में सरकारी स्कूलों की बदहाल हो चुकी स्थिति ने कुछ ऐसे ही चिंताजनक हालात पैदा कर दिए हैं।

हाल ही में आए पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड के 10वीं व 12वीं के परिणामों ने बच्चों व उनके परिजनों में हाहाकार मचाकर रख दी है। 10वीं कक्षा में सिर्फ 57.5 फीसदी बच्चे ही पास हो पाए हैं। ऐसे में शिक्षा से सरोकार रखने वाले लोगों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंचनी लाजिमी हैं।

सरकारी स्कूलों में आम तौर पर गरीबों के बच्चे पढ़ते हैं। इनमें दलित, पिछड़े समाज के बच्चों की गिनती सबसे अधिक है। ऐसे में सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति का सबसे अधिक असर इन्हीं वर्गों के बच्चों पर पड़ रहा है।

कमजोर आर्थिक स्थिति के चलते परिजन अपने बच्चों को महंगे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ा नहीं पाते। ऐसे में सरकारी स्कूलों की बदहाल शिक्षा व्यवस्था को जानने के बावजूद वे लाचार दिखाई देते हैं। चुनाव के दौरान लंबे-चौड़े वायदे कर सत्ता में आने वाली राजनीतिक पार्टियां कभी भी इनकी शिक्षा को लेकर गंभीर दिखाई नहीं दीं।

इस प्रदेश में कांग्रेस व अकाली दल-भाजपा की ही सरकारें रही हैं। साल 2002 से 2007 तक कांग्रेस, जबकि उसके बाद 2007 से 2017 तक यहां अकाली दल-भाजपा ने यहां शासन किया। अब कांग्रेस दोबारा सत्ता में लौटी है। प्रदेश में सरकारें बदलती रही हैं, लेकिन शिक्षा के ढांचे में सुधार होता कहीं दिखाई नहीं दिया। स्कूलों में अध्यापकों की भारी कमी है। जो अध्यापक हैं भी, उन्हें गैरशैक्षणिक कार्यों में लगा दिया जाता है। ऐसे में बच्चे पढ़ ही नहीं पाते। कई सरकारी स्कूल तो बिना इमारतों के ही चल रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार गुरमीत पलाही अपने लेख में लिखते हैं, यह हैरानीजनक है कि पंजाब के 1170 प्राइमरी स्कूलों में सिर्फ एक-एक अध्यापक है। 2011-2016 तक (अकाली-भाजपा सरकार के दौरान) की कैग (कंट्रोलर एंड आडिटर जनरल ऑफ इंडिया) की सर्वशिक्षा अभियान संबंधी रिपोर्ट खुलासा करती है कि 2011-12 में पहली से आठवीं कक्षा में सरकारी स्कूलों में 20,76,619 बच्चे दाखिल हुए थे, जो 2015-16 में घटकर 18,79,126 रह गए, जबकि निजी स्कूलों में 2011-12 में 19,63,844 बच्चे दाखिल हुए थे, जो कि बढक़र 20,83,313 हो गए।

इसका साफ अर्थ है कि सरकारी स्कूलों की खराब हालत के कारण पंजाब के लोगों का सरकारी स्कूलों से मोह भंग हो रहा है। आर्थिक तौर पर कमजोर लोग मजबूरी में ही अपने बच्चों को इन स्कूलों में पढऩे के लिए भेजते हैं।

परिजन कैसे चाहेंगे कि उनके बच्चे उन मिडिल स्कूलों में पढ़ें, जहां अध्यापक ही नहीं हैं? प्रदेश के अपर प्राइमरी (मिडिल) स्कूलों में 572 स्कूल ऐसे हैं, जहां तीन से कम अध्यापक हैं, जबकि इन स्कूलों में मंजूरशुदा 6 पोस्ट प्रति स्कूल जरूरी हैं।

कैग की रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब में 69 स्कूल ऐसे हैं, जिनकी अपनी कोई इमारत नहीं, 405 प्राइमरी स्कूल ऐसे हैं, जहां सिर्फ एक क्लास रूम है, 327 मिडिल स्कूल ऐसे हैं, जहां सिर्फ दो कमरे हैं, 99 स्कूलों में पीने के लिए पानी नहीं, 286 स्कूलों के पास खेल मैदान और 10,341 स्कूलों के पास फर्नीचर की कमी है। स्कूलों में खेल सुविधाएं नहीं हैं।

पंजाब के खराब हो चुके स्कूली शिक्षा तंत्र की हालत सुधारने के लिए जहां शिक्षा शास्त्रियों की अगुवाई में नई शिक्षा पालिसी बनाए जाने की जरूरत है, वहीं सरकारी स्कूलों में सुधार के लिए और गंभीर कदम भी तुरंत उठाए जाने चाहिएं।

फेल ना करने की नीति ने अनपढ़ बना दिए बच्चे
केंद्र में कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार के दौरान राइट टू एजुकेशन (आरटीई) एक्ट लागू किया गया था। इसके तहत सरकार ने सरकारी स्कूलों के कक्षा एक से आठवीं तक के विद्यार्थियों को किसी भी स्तर पर फेल ना करने की व्यवस्था की थी।

एक्ट के तहत ये बच्चे आठवीं कक्षा तक स्कूल आएं या ना आएं, ना तो इन्हें सजा देनी है और ना ही इन्हें फेल करना है। आठ वर्षों बाद इन्हें नौवीं कक्षा में दाखिल हो जाना है, लेकिन इसका नतीजा क्या निकला? स्कूलों में विद्यार्थियों की हाजिरी की बड़ी समस्या पैदा हो गई।

आज स्थिति यह है कि आठवीं कक्षा पास करने वाले विद्यार्थियों में से कई को अपना नाम तक लिखना नहीं आता। इस नीति से अध्यापकों के मन में भी कहीं ना कहीं यह बात बैठ गई कि उनका काम विद्यार्थियों को पुस्तकें बांटना, मिड डे मील बनाकर देने तक ही सीमित है। ऐसे में अध्यापकों में आलस पैदा हुआ।

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि डर का होना जरूरी है। बच्चों और अध्यापकों दोनों को ही पता है कि आठवीं कक्षा तक किसी भी किस्म का कोई डर नहीं है। फेल ना होने के चलते बच्चे पढ़ाई के प्रति लापरवाह हो गए, वहीं शिक्षक भी नतीजे को लेकर बेफिक्र हो गए। यही वजह रही कि कई बच्चे आठवीं पास करके भी ढंग से पढ़-लिख नहीं सकते। फेल ना करने की नीति पर पुनर्विचार किया जाना जरूरी है।

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