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मीडिया में हाशिये पर दलित-पिछड़े


Updated On: 2017-06-15 12:51:43 मीडिया में हाशिये पर दलित-पिछड़े

"मीडिया जगत में 10 से 50 हजार रुपये महीने तक की नियुक्तियां इतनी गोपनीयता से की जाती हैं कि उनके बारे में तभी पता चलता है जब वे हो जाती हैं। इन नियुक्तियों में ज्यादातर उच्च जाति के लोग आते हैं। वजह है मीडिया में फैसले लेने वाली जगहों पर उच्च वर्ण की हिस्सेदारी का 70 प्रतिशत से अधिक होना, जबकि उनकी देश में कुल आबादी मात्र आठ प्रतिशत ही है। उनके फैसले पर सवाल उठे या न उठे, इस सच को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।"

समाज में आज भी जाति आधारित असमानता का राज कायम है। मीडिया, जिसे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के तौर पर प्रचारित किया जाता है, पर काबिज होने में दलित पीछे ही नहीं, बल्कि बहुत पीछे हैं। आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि भारतीय मीडिया में वर्षों बाद आज भी दलित-पिछड़े हाशिए पर हैं। उनकी स्थिति सबसे खराब है। कहा जा सकता है कि ढूंढते रह जाओगे, लेकिन मीडिया में दलित नहीं मिलेंगे। गिने-चुने ही दलित मीडिया में हैं और वे भी उच्च पदों पर नहीं हैं।

-राष्ट्रीय मीडिया पर ऊंची जातियों का कब्जा- शीर्षक के तहत आए एक सर्वे ने मीडिया जगत से जुड़े दिग्गजों की नींद उड़ा दी थी। आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी चला। किसी ने समर्थन में दलित-पिछड़ों को आगे लाने की पुरजोर वकालत की। तो किसी ने यहां तक कह दिया कि भला किसने उन्हें मीडिया में आने से रोका है। मीडिया के दिग्गजों ने जातीय असमानता को दरकिनार करते हुए योग्यता का ढोल पीटा और अपना गिरेबान बचाने का प्रयास किया।

दलित-पिछड़े केवल राष्ट्रीय मीडिया से ही दूर नहीं हैं, बल्कि राज्य स्तरीय मीडिया में भी उनकी भागीदारी नहीं के बराबर है। वहीं ऊंची जातियों का कब्जा स्थानीय स्तर पर भी देखने को मिलता है। समाचार माध्यमों में ऊंची जातियों के कब्जे से इनकार नहीं किया जा सकता है।

मीडिया स्टडी ग्रुप के सर्वे ने जो तथ्य सामने लाए, हालांकि वह राष्ट्रीय पटल के हैं, लेकिन कमोवेश वही हाल स्थानीय समाचार जगत का है। जहां दलित-पिछड़े खोजने से न मिलेंगे। आजादी के वर्षों बाद भी मीडिया में दलित-पिछड़े हाशिए पर हैं। मीडिया के अलावा कई क्षेत्र हैं जहां अब भी सामाजिक स्वरूप के तहत प्रतिनिधित्व करते हुए दलित-पिछड़ों को नहीं देखा जा सकता है, खासकर दलितों को।

आंकड़े बताते हैं कि देश की कुल जनसंख्या में मात्र आठ प्रतिशत होने के बावजूद ऊंची जातियों का मीडिया हाउसों में 70 प्रतिशत से अधिक शीर्ष पदों पर कब्जा बना हुआ है। जहां तक मीडिया में जातीय व समुदायगत होने का सवाल है तो आंकड़े बताते हैं कि कुल 49 प्रतिशत ब्राह्मण, 14 प्रतिशत कायस्थ, सात-सात प्रतिशत वैश्य/जैन व राजपूत, नौ प्रतिशत खत्री, दो प्रतिशत गैर-द्विज उच्च जाति और चार प्रतिशत अन्य पिछड़ी जातियां हैं। इसमें दलित कहीं नहीं आते।

वहीं पर जब देश में अन्य पिछड़ी जातियों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण को लेकर विरोध और समर्थन का दौर चल रहा था तभी पुडुचेरी के प्रकाशन संस्थान नवयान पब्लिशिंग् ने अपनी वेबसाइट पर दिए गए विज्ञापन में बुक एडिटर पद के लिए स्नातकोत्तर छात्रों से आवेदन मांगा और शर्त रख दी कि सिर्फ दलित ही आवेदन करें। इस तरह के विज्ञापन ने मीडिया में खलबली मचा दी। आलोचनाएं होने लगीं। मीडिया के ठेकेदारों ने इसे संविधान के अंतर्गत जोड़ कर देखा। यह सही है या गलत, इस पर राष्ट्रीय बहस की जमीन तलाशी गई। दिल्ली के एक समाचार पत्र ने इस पर स्टोरी छापी और इसके सही गलत को लेकर जानकारों से सवाल दागे। प्रतिक्रिया स्वरूप संविधान के जानकारों ने इसे असंवैधानिक नहीं माना।

सवाल यह उठता है कि अगर -नवयान पब्लिशिंग- ने खुलेआम विज्ञापन निकाल कर अपनी मंशा जाहिर कर दी तो उस पर आपत्ति क्यों? वहीं गुपचुप ढंग से मीडिया हाउसों में ऊंची जाति के लोगों की नियुक्ति हो जाती है तो कोई समाचार पत्र उस पर बवाल नहीं करता है और न ही सवाल उठाते हुए स्टोरी छापता है? कुछ वर्ष पहले बिहार की राजधानी पटना से प्रकाशित एक राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक ने जब अपने कुछ पत्रकारों को निकाला था, तब एक पत्रिका ने अखबार के जाति प्रेम को उजागर किया था। पत्रिका ने साफ-साफ लिखा था कि निकाले गए पत्रकारों में सबसे ज्यादा पिछड़ी जाति के पत्रकारों का होना अखबार का जाति प्रेम दर्शाता है, जबकि निकाले गए सभी पत्रकार किसी मायने में सवर्ण जाति के रखे गए पत्रकारों की काबिलियत के मामले में कम नहीं थे।

जरूरी काबिलियत के बावजूद मीडिया में अभी तक सामाजिक स्वरूप के मद्देनजर दलित-पिछड़े का प्रवेश नहीं हुआ है। जाहिर है, कहा जाएगा कि किसने आपको मीडिया में आने से रोका? तो हमें इसके लिए कई पहलुओं को खंगालना होगा। सबसे पहले मीडिया में होने वाली नियुक्ति पर जाना होगा। मीडिया में होने वाली नियुक्ति पर सवाल उठाते हुए चर्चित मीडियाकर्मी राजकिशोर का मानना है कि दुनिया भर को उपदेश देने वाले टीवी चैनलों में, जो रक्तबीज की तरह पैदा हो रहे हैं, नियुक्ति की कोई विवेकसंगत या पारदर्शी प्रणाली नहीं है। सभी जगह सोर्स चल रहा है।

वे मानते हैं कि मीडिया जगत में दस से पचास हजार रुपये महीने तक की नियुक्तियां इतनी गोपनीयता के साथ की जाती हैं कि उनके बारे में तभी पता चलता है जब वे हो जाती हैं। इन नियुक्तियों में ज्यादातर उच्च जाति के ही लोग आते हैं। इसकी खास वजह यह है कि मीडिया चाहे वह प्रिंट (अंग्रेजी-हिंदी) हो या इलेक्ट्रॉनिक, फैसले लेने वाले सभी जगहों पर उच्च वर्ण की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से अधिक है, जबकि उनकी कुल आबादी मात्र आठ प्रतिशत ही है। उनके फैसले पर सवाल उठे या न उठे, इस सच को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

वहीं दूसरे पहलू के तहत जातिगत आधार सामने आता है। प्रख्यात पत्रकार अनिल चमडिया कास्ट कंसीडरेशन को सबसे बड़ा कारण मानते हैं। चमडिया ने अपने सर्वे का हवाला देते हुए बताया है कि मीडिया में फैसले लेने वालों में दलित और आदिवासी एक भी नहीं है। जहां तक सरकारी मीडिया का सवाल है तो वहां एकाध दलित-पिछड़े नजर आ जाते हैं। चमडिया कहते हैं कि देश की कुल जनसंख्या में मात्र आठ प्रतिशत ऊंची जाति की हिस्सेदारी है और मीडिया हाउसों में फैसले लेने वाले 71 प्रतिशत शीर्ष पदों पर उनका कब्जा बना हुआ है।

यह बात स्थापित हो चुकी है और कई लोगों ने अपने निजी अनुभवों के आधार पर माना है कि कैसे कास्ट कंसीडरेशन होता है। यही वजह है कि दलितों को मीडिया में जगह नहीं मिली। जो भी दलित आए, वे आरक्षण के कारण ही सरकारी मीडिया में आए। रेडियो-टेलीविजन में दलित दिख जाते हैं, दूसरी जगहों पर कहीं नहीं दिखते। जहां तक मीडिया में दलितों के आने का सवाल है तो उनको आने का मौका ही नहीं दिया जाता है।

चमडिया का मानना है कि मामला अवसर का है। हम लोगों का निजी अनुभव यह रहा है कि किसी दलित को अवसर देते हैं तो वह बेहतर कर सकता है। यह हम लोगों ने कई प्रोफेशन में देख लिया है। दलित डॉक्टर, इंजीनियर, डिजाइनर आदि को अवसर मिला तो उन्होंने बेहतर काम किया। दिल्ली यूनिवर्सिटी में बेहतर अंग्रेजी पढ़ाने वाले लेक्चररों में दलितों की संख्या बहुत अच्छी है, यह वहां के छात्र कहते हैं।

बात अवसर की है और दलितों को पत्रकारिता में अवसर नहीं मिलता है। पत्रकारिता में अवसर कठिन हो गया है। मीडिया प्रोफेशन में मान लीजिए कोई दलित लडक़ा पढक़र, सर्टिफिकेट ले भी ले और वह काबिल हो भी जाए, तकनीक उसको आ भी जाए, तो भी उसकी जाति भर्ती में रुकावट बन जाती है।
साभार : संजय कुमार (लेखक वरिष्ठ पत्रकार व साहित्यकार हैं)

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