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आठ वर्षों में गौरक्षकों की हिंसा में मारे गए 28 भारतीय, मरने वालों में 86 फीसदी मुसलमान


Updated On: 2017-07-02 19:52:05 आठ वर्षों में गौरक्षकों की हिंसा में मारे गए 28 भारतीय, मरने वालों में 86 फीसदी मुसलमान

नई दिल्ली। पिछले करीब आठ वर्षों (2010 से 2017) के दौरान स्वघोषित गौरक्षकों द्वारा की गई हिंसा के 51 फीसदी मामलों में मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया गया, जबकि इस तरह की 68 वारदातों में मरने वाले 28 भारतीय नागरिकों में 86 फीसदी पीडि़त मुस्लिम समुदाय के रहे। यह खुलासा इंडियास्पेंड की विश्लेषण के आधार पर तैयार की गई रिपोर्ट में किया गया है।

विश्लेषण रिपोर्ट के मुताबिक, इस तरह की हिंसा के 97 फीसदी मामले मई, 2014 में नरेंद्र मोदी के देश की केंद्रीय सत्ता में आने के बाद दर्ज किए गए हैं। इस दौरान गौरक्षा के नाम पर हुई 63 हिंसक वारदातों में से 32 वारदात ऐसे राज्यों में हुईं, जहां भाजपा की सरकार है।

बीते सात वर्षों के दौरान गौरक्षा के नाम पर मारे गए 28 लोगों में से 24 व्यक्ति मुस्लिम समुदाय के हैं, जबकि इस दौरान 124 लोग इस तरह की हिंसा में घायल हुए। इंडियास्पेंड का विश्लेषण कहता है कि 52 फीसदी हिंसा के मामले अफवाहों पर आधारित रहे।

गौरतलब है कि हिंसा के मामलों से संबंधित राष्ट्रीय या राज्य के आंकड़ों में गौ-रक्षा के नाम पर हुई हिंसा या भीड़ द्वारा की गई हिंसा को अलग से वर्गीकृत नहीं किया जाता। इंडियास्पेंड का विश्लेषण देश में धर्म और गौरक्षा के नाम पर लगातार बढ़ रही इस तरह की हिंसा के आंकड़ों का एकमात्र सांख्यिकीय दस्तावेज है।

गौरक्षा के नाम पर होने वाली हिंसा के मामले में 2017 अब तक का सबसे बुरा वर्ष साबित हुआ है। मौजूदा वर्ष के शुरुआती छह महीनों में गौरक्षा के नाम पर हिंसा के 20 मामले दर्ज किए गए हैं, जो बीते साल (2016) से 75 फीसदी अधिक हैं।

देश के 29 राज्यों में से 19 राज्यों में अब तक गौरक्षा के नाम पर हिंसा की घटनाएं दर्ज की गई हैं। इनमें उत्तर प्रदेश में 10 मामले, हरियाणा में नौ मामले, गुजरात में छह मामले, कर्नाटक में छह मामले, मध्य प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान में चार-चार मामले सामने आए हैं। पूर्वोत्तर के सात राज्यों में सिर्फ असम में 30 अप्रैल, 2017 को गौरक्षा के नाम पर दो व्यक्तियों की हत्या का मामला सामने आया है।

बीते आठ वर्षो के दौरान गौ-रक्षा के नाम पर हुई हिंसा के 63 मामलों में से 32 मामलों में (50.8 फीसदी) में मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया गया, जबकि पांच मामलों (7.9 फीसदी) में दलित समुदाय को निशाना बनाया गया, जबकि तीन मामलों (4.8 फीसदी) में पीडि़त सिख या हिंदू रहे।

इतना ही नहीं इस तरह की हिंसा के आठ फीसदी मामलों में पुलिस अधिकारी और दर्शक पीडि़त रहे, वहीं 27 फीसदी मामलों में महिलाओं को निशाना बनाया गया। पांच फीसदी मामलों में कोई गिरफ्तारी नहीं हुई, वहीं 13 मामलों (21 फीसदी) में पुलिस ने उल्टे पीडि़तों के खिलाफ ही मामले दर्ज कर दिए।

बीते आठ वर्षों के दौरान इस तरह की हिंसा के 63 में से 23 हमलों में हमलावर या तो भीड़ थी या बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद और स्थानीय गौरक्षक समितियों जैसे हिंदू संगठनों से जुड़े लोगों का समूह था। इस अवधि में 10 जून, 2012 को गौरक्षा के नाम पर हिंसा का पहला मामला पंजाब के मानसा जिले में स्थित जोगा कस्बे में एक कारखाने के पास से 25 पशुओं का कंकाल मिलने के बाद दर्ज किया गया। विश्लेषित आंकड़ों के मुताबिक, गौ-रक्षा के नाम पर हुई हिंसा के 52 फीसदी मामलों के पीछे मात्र अफवाह थी।

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