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भाजपा के 40 दलित एमपी, पर दलित अत्याचारों पर ये चुप क्यों? जवाब डॉ. अंबेडकर के पास है


Updated On: 2017-07-30 12:38:17 भाजपा के 40 दलित एमपी, पर दलित अत्याचारों पर ये चुप क्यों? जवाब डॉ. अंबेडकर के पास है

हैदराबाद यूनिवर्सिटी के पीएचडी स्कॉलर रोहित वेमुला के मामले में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का जिस तरह का रवैया रहा, उससे यह पता चलता है कि केंद्र की सत्ता में दलित हितों की महत्ता कितनी कम है।

रोहित वेमुला की मौत के बाद इसी मामले में आरोपों के घेरे में आए केंद्रीय श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय और केंद्रीय मानव संसधान मंत्रालय रोहित को ही घेरने में लग गए। इनकी ओर से हैदराबाद यूनिवर्सिटी की अंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन, जिसका रोहित वेमुला भी सदस्य था, को ही जातिवादी और राष्ट्र विरोधी घोषित कर दिया गया।
रोहित वेमुला की ओर से खुदकुशी किए जाने के बाद भाजपा के एक प्रवक्ता ने ट्विटर पर रोहित को राष्ट्र विरोधी और आतंकवाद समर्थक तक ऐलान दिया।

इसी तरह भाजपा के महासचिव पी. मुरलीधर राव ने भी रोहित को आतंकवाद का समर्थक बता दिया। वहीं उस समय की मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय की मंत्री स्मृति ईरानी ने यह कह दिया कि रोहित खुदकुशी मामले का उसकी जाति से कोई लेना-देना नहीं है।

सिर्फ भाजपा को आमतौर पर ब्राह्मणवादी पार्टी कहा जाता है, जबकि असल में कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियां भी इसी खांचे में फिट बैठती हैं। रोहित वेमुला ने माक्र्सवादी स्टूडेंट फेडरेशन में होने वाले जाति भेदभाव से बुरी तरह निराश होकर ही उसे छोड़ा था, जिसके बाद वह अंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन के साथ जुड़ गया था।

बहरहाल, लोकसभा में इस समय कुल आरक्षित 66 सीटों में से 60 फीसदी पर भाजपा का कब्जा है। 2014 के चुनाव में भाजपा के 40 दलित एमपी जीतकर लोकसभा पहुंचे हैं। भाजपा के कुल लोकसभा सांसदों में से 15 फीसदी दलित हैं।

अब सवाल यह उठता है कि दलित एमपी की इतनी अधिक संख्या होने के बावजूद भाजपा ने आखिर रोहित वेमुला को क्यों गलत ढंग से लिया? दलित एमपीज ने अपनी सरकार और पार्टी पर रोहित वेमुला मामले में दबाव क्यों नहीं बनाया। भाजपा नेताओं को रोहित वेमुला की छवि आतंकवाद समर्थक के तौर पर पेश करने की अनुमति किसने दी?

इन सवालों के बीच यह बात उभरकर सामने आती है कि ऊंची जाति की राजनीतिक पार्टियों के आरक्षित सीटों से जीतकर लोकसभा पहुंचने वाले दलित एमपी अपने समाज का प्रतिनिधित्व कर पाने में प्रभावशाली साबित नहीं हो रहे हैं।

लोकसभा चुनाव में आरक्षित सीटों से भाजपा के 40 एमपी जरूर बन गए, लेकिन 2014 में भाजपा सरकार बनने पर कैबिनेट में जीते हुए इन दलित एमपी में से एक को भी जगह नहीं दी गई। हालांकि साल 2015 के नवंबर में इन 40 में से दो को सरकार में ले लिया गया, लेकिन उन्हें कैबिनेट मंत्री नहीं बनाया गया, बल्कि राज्यमंत्री का दर्जा दिया गया।

इससे साफ है कि लोकसभा चुनाव में जीतकर आए इन 40 दलित एमपी की राजनीतिक ताकत असरदार नहीं है। एक तरफ जहां भाजपा जीत के लिए दलित वोटों पर निर्भर करती है, ऐसे में आरक्षित सीटों से जीतकर आए ये दलित एमपी दलितों के मुद्दों पर कहीं भी आवाज उठाते नजर नहीं आ रहे हैं।

बाबा साहब अंबेडकर ने संयुक्त मतदान प्रणाली पर उठाए थे सवाल
ऊंची जातियों की अगुवाई वाली राजनीतिक पार्टियों में दलितों के मुद्दों पर इन्हीं वर्गों के एमपी या एमएलए के खुलकर आवाज न उठा पाने के पीछे के कारण पर बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कई साल पहले ही तस्वीर साफ कर दी थी।

अंग्रेजों के शासन के दौरान 1931 में लंदन में गोलमेज कांफ्रेंस रखी गई थी। इसमें देश के संवैधानिक भविष्य पर चर्चा होने थी। कांफ्रेंस में दलितों-शोषितों के अधिकारों की बात रखते हुए डॉ. अंबेडकर ने इन वर्गों के लिए पृथक चुनाव प्रणाली की वकालत की थी, जिसके तहत दलित वोटरों द्वारा दलित प्रतिनिधियों को चुने जाने की व्यवस्था हो।

अंग्रेजी हुकूमत तब बाबा साहब अंबेडकर द्वारा तथ्यों समेत रखे गए विचारों से पूरी तरह सहमत हो गई। हालांकि कांग्रेस नेता मोहन दास कर्मचंद गांधी इस चुनाव प्रणाली को जाति आधारित बताते हुए इसके विरोध में खड़े हो गए।
वह मरण व्रत पर बैठ गए, जिससे देश में हालात खराब हो गए। दलितों पर देश में हमले होने लगे। ऐसे में मजबूरीवश बाबा साहब अंबेडकर को गांधी के साथ पूना करार करना पड़ा।

गांधी के विरोध के चलते दलितों शोषितों से पृथक निर्वाचन का अधिकार छीन लिया गया, जिसकी जगह देश में संयुक्त मतदान प्रणाली को ही चुना गया, जो कि आज भी जारी है। इसके तहत दलितों को पृथक निर्वाचन का अधिकार देने की बजाय उनके लिए कुछ सीटें आरक्षित करने की व्यवस्था कर दी गई।

दलितों शोषितों को पृथक निर्वाचन प्रणाली का अधिकार न मिल पाने का दुख बाबा साहब अंबेडकर को जीवन के अंतिम समय तक भी रहा। 1955 में डॉ. अंबेडकर ने कहा था, गांधी की संयुक्त चुनाव प्रणाली वाली व्यवस्था के चलते ऐसे दलित चुनकर आएंगे, जो कि आजाद प्रतिनिधि होने की बजाय असल में हिंदुओं के गुलाम होंगे।

62 साल पहले बाबा साहब द्वारा कही गई ये बातें आज के राजनीतिक हालात की तस्वीर साफ कर देती हैं। रोहित वेमुला खुदकुशी, डेल्टा मेघवाल की मौत, उना (गुजरात) के दलित उत्पीडऩ, सहारनपुर कांड जैसे गंभीर मुद्दे पर भी भाजपा में बैठे 40 दलित सांसदों का न बोल पाना उनके दलितों के प्रतिनिधि होने पर सवाल खड़े करता है।

यह स्थिति सिर्फ भाजपा में नहीं है, बल्कि कांग्रेस व अन्य ऊंची जाति की अगुवाई वाली राजनीतिक पार्टियों की भी है। हरियाणा में कांग्रेस सरकार के दौरान दलितों के खिलाफ मिर्चपुर और भगाना कांड जैसी बड़ी घटनाएं हुईं, लेकिन इन मुद्दों पर इन्हीं पार्टी के एमएलए या एमपी दलितों की आवाज नहीं बन पाए।

ऊंची जाति की अगुवाई वाली पार्टियों में दलित एमपी, एमएलए की अपने ही समाज के प्रति चुप्पी गंभीर सवाल खड़े करती है। साथ ही बाबा साहब द्वारा पहले ही जाहिर कर दी गई चिंता को सही साबित करती दिखाई देती है।
(इनपुट : scroll.in)

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