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देश का हर दूसरा आदिवासी, हर तीसरा दलित-मुसलमान गरीब


Updated On: 2019-07-16 10:27:57 देश का हर दूसरा आदिवासी, हर तीसरा दलित-मुसलमान गरीब

भारत में अमीरी-गरीबी का आंकड़ा जाति और संप्रदाय के आधार पर अलग-अलग है। संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की एक रिपोर्ट में कुछ ऐसा ही बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, देश में आदिवासी, दलित और मुसलमान गरीबी से सबसे अधिक पीडि़त हैं।

एक मीडिया खबर के मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में हर दूसरा गरीब शख्स आदिवासी और तीसरा शख्स दलित व मुस्लिम है। 27 फीसदी बहुआयामी गरीबी (आय, स्वास्थ्य सुविधाएं आदि का पैमाना) के साथ भारत विश्व में पहले स्थान पर है। बहुआयामी गरीबी का मतलब व्यक्ति के पास मौजूद धन-संपत्ति के साथ-साथ पोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा, साधन और जीवन स्तर से है।

संयुक्त राष्ट्र द्वारा भारत में जातीय आधार पेश किया गया गरीबी का आंकड़ा परेशान करने वाला है। संयुक्त राष्ट्र के डेवलपमेंट प्रोग्राम (यूएनडीपी), ऑक्सफोर्ड पॉवर्टी और ह्यूमन डेवलपमेंट इनीशिएटिव (ओपीएचआई) ने 2018 के जिस आंकड़े को पेश किया है, उसके मुताबिक, गरीबी सूचकांक में दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों की स्थिति अच्छी नहीं है।

रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2018 में भारत का हर दूसरा गरीब व्यक्ति अनुसूचित जनजाति (एसटी) और हर तीसरा शख्स अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग से संबंधित है। इसी तरह हर तीसरा मुस्लिम भी सभी प्रकार की गरीबी से घिरा हुआ है।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का करीब 50 फीसदी आदिवासी वर्ग गरीब है। इसी तरह 33 फीसदी दलित और 33 फीसदी मुसलमान भी गरीबी की श्रेणी में आते हैं। रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि दुनिया की कुल गरीब आबादी में से 27 फीसदी भारतीय हैं। मतलब, भारत में दुनिया की सबसे अधिक गरीब आबादी रहती है। भारत में सवर्ण जातियां बेहतर हालात में हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि सवर्ण जातियों में 15 फीसदी लोग गरीबी के शिकार हैं।

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