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सत्ता परिवर्तन किए बिना बहुजन समाज की समस्याओं का नहीं हो पाएगा समाधान


Updated On: 2019-08-24 09:19:25 सत्ता परिवर्तन किए बिना बहुजन समाज की समस्याओं का नहीं हो पाएगा समाधान

दिल्ली के तुगलकाबाद में श्री गुरु रविदास मंदिर को गिराने को लेकर लोगों में केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ गुस्सा है। वे केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रहे हैं। लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली इन घटनाओं का विरोध होना जायज है, लेकिन उन्हें कोई ऐसा रास्ता भी तलाशना होगा, जिससे उनके खिलाफ होने वाली ऐसी घटनाओं का स्थायी समाधान निकाला जा सके।

केंद्र सरकार के खिलाफ संघर्षरत इन लोगों को विरोध के साथ-साथ बहुजन समाज विरोधी सत्ता के बदलाव पर भी केंद्रित होना होगा। अगर वे सिर्फ और सिर्फ विरोध पर ही केंद्रित रहेंगे तो यथास्थिति बनी रहेगी और उनके हालात नहीं सुधरेंगे। अगर वे सत्ता परिवर्तन की दिशा में काम नहीं करेंगे तो उनके सिर्फ धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि नौकरियां, आरक्षण, शिक्षा व सेहत सुविधाएं सभी जाती रहेंगी, जैसा कि हम आज देख रहे हैं। शोषित समाज के लोग गरीबी व अन्यायपूर्ण शासन प्रबंध का शिकार होकर रह जाएंगे।

संघर्षरत लोगों को यह बात ध्यान रखने की जरूरत है कि मामला सिर्फ गुरु रविदास मंदिर की जमीन लेने और वहां पर मंदिर के निर्माण करने का नहीं है, बल्कि बहुजन समाज के छीने जा रहे अधिकारों की बहाली और देश में दलित, पिछड़े वर्गों व धार्मिक अल्पसंख्यकों के अनुकूल सत्ता की स्थापना का भी है। जब तक उनके अनुकूल सत्ता स्थापित नहीं हो जाती, तब तक उनकी मुश्किलें इसी तरह बरकरार रहेंगी, सडक़ों पर उनका टकराव होता रहेगा और बेकसूर लोग नाजायज केसों में फंसते रहेंगे।

इसलिए बहुजन समाज के लोगों को यह आंदोलन व्यापक दायरे में लाना होगा और सत्ता में बदलाव के विचार को केंद्र में रखकर लडऩा होगा।

बहुजन विचारधारा विरोधी पार्टियों (भाजपा, कांग्रेस, आप आदि) को सत्ता से हटाकर बहुजन समाज की हिमायती राजनीति को सत्ता में लाना होगा, जिसका प्रतिनिधित्व बहुजन समाज पार्टी (बसपा) बहन कुमारी मायावती के नेतृत्व में करती है।

बहुजन समाज के लोगों को इस बात का भी ख्याल रखना चाहिए कि श्री गुरु रविदास धार्मिक स्थल का मामला सत्ता के चरित्र से भी जुड़ा हुआ है।

जब उत्तर प्रदेश में बहन कुमारी मायावती के नेतृत्व में बसपा सरकार थी, तब वहां पर श्री गुरु रविदास घाट, अंबेडकर स्मारक, बहुजन समाज के महापुरुषों के नाम पर जिले बने थे। यहां तक कि लोक भलाई की योजनाएं भी उनके नाम पर बनी थीं। वहीं, जब सत्ता बहुजन विरोधी हो गई तो यह सब उनसे छिनता चला गया।

साहब कांशीराम की एक बात गौर करने वाली है। वह कहा करते थे, "जो सत्ता का विरोध करते हैं, वे उसका विकल्प भी दें।" कुछ इसी तरह ही साहब कांशीराम ने कांग्रेस और भाजपा के विकल्प के रूप में बहुजन समाज पार्टी को स्थापित किया था।

भाजपा और कांग्रेस पर बहुजन समाज विरोधी राजनीति के आरोप लगते रहे हैं। दूसरी ओर बसपा में बहुजन समाज के पक्ष में बदलाव की उम्मीद नजर आती है। सत्ता में आने पर बसपा ने बहुजन समाज के अनुकूल राज्य प्रबंध स्थापित करके यह साबित भी किया है।

बसपा का विरोध करने का मतलब यथास्थिति बनाए रखना है, मतलब कि कांग्रेस-भाजपा को सत्ता में स्थापित करना है। अगर यथास्थिति बनी रहेगी तो धार्मिक अल्पसंख्यकों, दलितों-पिछड़ों पर अत्याचार और उनसे धक्केशाही इसी तरह होती रहेगी। उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन होता रहेगा। सरकारी नीतियां लागू करते समय उनकी अनदेखी होती रहेगी।

ऐसे में बहुजन समाज के लोगों को चाहिए कि वे संघर्ष करने के साथ-साथ सत्ता परिवर्तन के लिए भी काम करें। बहुजन समाज की अनदेखी करने वाली ताकतों को सत्ता से उतारकर उनकी बेहतरी के लिए काम करने वाली बसपा को मजबूती से स्थापित करके ही इस समाज की समस्याओं का स्थायी समाधान हो सकता है।

अगर सत्ता परिवर्तन नहीं होगा तो बहुजन समाज की समस्याएं भी ना सिर्फ बरकरार रहेंगी, बल्कि और बढ़ती जाएंगी। बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर इसीलिए कहा करते थे-सत्ता वह मास्टर चाबी है, जिससे हर समस्या का हल किया जा सकता है।
-बलविंदर कुमार
(लेखक बहुजन समाज पार्टी पंजाब के पदाधिकारी हैं)

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